Tuesday, January 09, 2018

मेला में ‘किताबगंज’

जब दिल्ली में था तो गाम के मेले को याद करता था। मेले की पुरानी कहानी बांचता था, और अब जब दिल्ली से दूर अपने गाम-घर में हूं तो 'किताब मेला' और ‘किताबगंज’ की याद आ रही है।

कॉलेज के दिनों में और फिर ख़बरों की नौकरी करते हुए जनवरी में प्रगति मैदान अपना ठिकाना हुआ करता था। दिन भर  उस विशाल परिसर में शब्दों के जादूगरों से मिलता था, उन्हें महसूस करता था। हर बार अनुपम मिश्र से मिलता था। बाजार की चकमक दुनिया को अपनी बोली-बानी से निर्मल करने का साहस अनुपम मिश्र को ही था।अब जब वे नहीं हैं तो लगता है कि तालाब में पानी कम हो गया है, आँख का पानी तो कब का सूख गया...

उसी पुस्तक मेले में अपने अंचल के लोग मिल जाते थे तो मन साधो-साधो कह उठता था।अपने अंचल के लेखक चंद्रकिशोर जायसवाल से वहीं पहली दफे मिला था। इस बार उसी मेले में अपने अंचल के लेखक पुष्यमित्र Pushya Mitra की किताब ‘ जब नील का दाग़ मिटा-चम्पारण -1917’ राजकमल प्रकाशन से आई है। पुष्यमित्र भैया के लेखन में माटी की ख़ुश्बू है। मेले जाकर उस किताब को ख़रीदने की इच्छा थी। साथ ही सच्चिदानंद सिंह Sachidanand Singh जी किताब ‘ब्रह्मभोज ‘ को भी मेले में महसूस करना था।

हर साल हमने उस मेले को महसूस किया है। लेकिन इस बार समय के फेर ने इस किसान को प्रगति मैदान से दूर रख दिया है लेकिन आभासी दुनिया में आवाजाही के कारण पुस्तक मेले को दूर से ही सही लेकिन महसूस कर रहा हूं।

इस बार मेले में मैथिली का मचान भी लगा है, जहां दिल्ली वासी मैथिल प्रवासी का जुटान हो रहा है। उसको लेकर मन उत्सुक है। बार-बार फ़ेसबुक पर मैथिली मचान को देखता हूं।

आज गाँव में खेत की दुनिया में जीवन की पगडंडी तलाशते हुए किताबों की उस मेले वाली दुनिया की ख़ूब याद आ रही है। इसी बीच आभासी दुनिया की वजह से राजकमल प्रकाशन की दुनिया में ‘किताबगंज’ का सुख ले रहा हूं, वहाँ कवितापाठ का अन्दाज़ भा रहा है।

तस्वीरों और विडियो ज़रिए पता चल रहा है कि मेले में बाँस का ख़ूबसूरती से इस्तेलाम हुआ है। यह सब देखकर अच्छा लगता है।  और चलते-चलते इस किसान की किताब ‘इश्क़ में माटी सोना’ को भी राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल से ख़रीदिएगा, लेखक को अच्छा लगेगा।

Friday, January 05, 2018

राजशेखर का गाम-घर

समय का फेर परेशान कर रहा है। लाठी लिए कबीर मिलते हैं और कहते हैं , “यह वक़्त भी गुज़र जाएगा..” इस उतार-चढ़ाव के बीच समय यात्रा भी करवा रहा है। कुछ काम होते हैं, जो विपत्तियों के बीच भी मन को मज़बूत कर पूरा करना होता है। नियति सब काम अपने ढंग से शायद पूरा करवाता है। उन्हीं सब काम के सिलसिले में यात्रा में हूं। 

कभी कटिहार तो कभी मधेपुरा-सहरसा। इन सब जगहों ने ग़ज़ब की ताक़त दी है। मधेपुरा में कुछ लोग हैं जोमन-मीतबन गए हैं। मन के भीतर साहस का संचार ये लोग कर रहे हैं। 

इन्हीं यात्राओं के बीच भेलवा गाम जाना हुआ। मधेपुरा का सुदूर गाँव है भेलवा। मेरे प्रिय राजशेखर का गाम। शब्दों के ज़रिए राज भाय मेरे जीवन में आए और फिर कब जीवन का हिस्सा बन गए, उसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। 

टूटे मन के साथ राजशेखर के दुआर पर पहुँचा, वो भी पहली बार। सफ़ेद चादर ओढ़े उनका परिसर तन और मन को स्थिर करने का काम किया।  दुआर पर हरी दूब स्मृति की चादर माफ़िक़ थी। पुआल का सुंदर सा ढेर देखकर बाबूजी की याद गई। आँगन में चूल्हा टूटे मन को जोड़ने का काम किया। बाबूजी  और पापा एक साथ याद आने लगे। राजशेखर का लिखा उन्हीं के आँगन में मन में बजने लगा-
फिर आजा तू ज़मीं पे,
और जा कहीं,
तू साथ रह जा मेरे,
कितने दफे दिल ने कहा,
दिल की सुनी कितने दफे....”

राजशेखर से उन्हीं के गाम-घर में मिलकर लगा हम खानाबदोश रूह वाले मुहाजिरों के लिए यह एक सराय है। दरअसल हम सब मुहाजिर ही तो हैं।हमारा ठिकाना तो कहीं और है...एक लंबे रास्ते की दूरी तय करने के बाद, जब मन को कोई स्थिर कर देता है तो लगता है कुछ देर रुककर रूह से बात कर लूँ। बीते हुए रास्ते, भूलते हुए चेहरे सबकुछ याद आने लगे। 

इस वक़्त जब मन के भीतर कबीर की लाठी बहुत आवाज दे रही है, ऐसे समय में राजशेखर का गाम साहस दे रहा है। मन के भीतर माटी और पानी का संजोग बनता दिखता है। राजशेखर भाय से मिलकर लगा कि समय मन तोड़ता  है तो दूसरे ही पल समय का दूसरा भाग साहस भी देता है। 

Tuesday, December 19, 2017

अनुपम आदमी ‘अनुपम मिश्र’

अनुपम मिश्र कब ज़िंदगी में आए, यह बता नहीं सकता। अपनी किताबआज भी खरे हैं तालाबकी तरह वह हमेशा संग है। उनसे मुलाक़ात कम होती थी लेकिन जब भी मिलता तो लगता हमेशा इनसे मुलाक़ात होती है। उनसे पहली मुलाक़ात दिल्ली के आईटीओ के क़रीब हुई थी। पायजमा-कुर्ता और चश्मा , संग में झोला। देखकर लगा मानो सत्य को महसूस कर रहा हूं। वे मुझे गाम के तालाब की तरह लगते थे, जिसमें झाँककर हम अपना चेहरा पहचान  सकते थे, एकदम निर्मल। बातचीत में वे पर्यावरण और भाषा के बताते थे। अनुपम मिश्र कहते थे कि भाषा मन और माथा दोनों है। आधी बाज़ू का कुर्ता पहनने वाला वह शख़्सपूरा और अनुपम आदमीथा। उनकी भाषा हमारे लिए जीवन  का व्याकरण है। वे  ऐसे बोलते थे कि कठिन से कठिन भी आसान लगने लगता था। गंभीर से गंभीर विषय को भी वे सहज-सुगम बना देते थे। 

कहीं जब बोलना होता है तो मैं अनुपम मिश्र के बारे में ज़रूर बोलता हूं। वे इस दुनिया में एक लिबास की तरह थे, जिसमें गांधी का भाव था। उनके बारे में बोलकर-लिखकर लगता है जैसे मन का पर्यावरण थोड़ा साफ़ हो गया हो। यही ताक़त है उस आदमी की।हमारा पर्यावरणहमें पढ़ना चाहिए। अनुपम मिश्र की  इस किताब में देश है। 

खेती बाड़ी और गाम घर करते हुए मैं अनुपम मिश्र को अनुभव करता हूं। वे परंपरागत वर्षा के जल के सरंक्षण की पुरज़ोर वकालत करते थे। वे पानी के पहरेदार थे। देश प्रेम के इस उन्मादी दौर में जब विकास के नाम पर सिर्फ विनाश की मूर्खतापूर्ण होड़ लगी है, अनुपम मिश्र का होना, एक घुप्प अंधेरे की तरह। आज उनकी बरसी है, उनकी कही यह बात आप सब भी पढ़िए-


"इस दुनिया में हम कितने भी बड़े उद्देश्य को लेकर दीया जलाते हैं,तेज़ हवा उसे टिकने  नहीं देती। शायद हमारे जीवन के दीये में पानी ही ज़्यादा होता है, तेल नहीं। स्नेह की कमी होगी इसलिए जीवन बाती चिड़चिड़ तिड़तिड़ ज़्यादा करती है, एक सी संयत होकर जल नहीं पाती। हम अपना अँधेरा दूर कर पाते हैं , दूसरों का। हम थोड़ा अपने भीतर झांकें तो हममें से ज़्यादातर का जीवन एक तरह से कोल्हू के बैल जैसा बना दिया गया है। हम गोल गोल घूमते रहते हैं आँखों पर पट्टी बांधे| "