Tuesday, May 19, 2015

किसानों के अन्न बैंक ‘बखारी’ की कहानी

girindra nath jhaमुझे याद है जब बचपन में धान की तैयारी होती थी तो घर के सामने महिलाएं एक गीत गाती थीं. ‘सब दुख भागल कि आइलअगहनमा, धनमा के लागल कटनिया, भर लो कोठारी, देहरियो, भरल बा, भरल बाटे बाबा बखरिया अबकी बखारी में भरी-भरी धनमा, छूटी जइहें बंधक गहनमा।” इस गीत में बखारी और धान के संबंध के बारे में विस्तार से बताया गया है। बखारी, जो किसानों का अन्न बैंक होता है लेकिन अब यह बैंक गायब होने के कगार पर है और ऐसे में इस तरह के गीत भी सुनने को नहीं मिलते हैं।

अन्नदाताओं की जिन्दगी को जब आप नजदीक से देखेंगे तो पाएंगे कि वे गाँव घर में ही दुनिया की सारी खूबियों को समाकर रखते आए हैं। ये कोई नई कहानी नहीं है बल्कि बरसों पुरानी है। उनका अपना एक अन्न बैंक होता है। गोदाम संस्कृति तो अब आई है लेकिन अन्न रखने की उनकी अपनी शैली है, जिसे कोसी इलाके में बखारी कहते हैं।
bkhari 

गाँव से जुड़ाव रखने वाले यह बात जानते होंगे कि किसानी कर रहे लोग सालभर के लिए अन्न जमाकर रखते हैं। जब गोदाम संस्कृति का आगमन गाँव में नहीं हुआ था तब बड़े-बड़े किसान तो अपने घरों के सामने कई बखारी बनाकर रखते थे, जहां गाँव के छोटे और सीमांत किसान अपना अन्न रखते थे। गाँव के आपसी समन्वय को इस छोटी सी बात से आप समझ सकते हैं।


”धान के पान, मोरो पिया खइहें पान।” इस कहावत का अर्थ यह है कि यदि धान का ही पान है तो, मेरे पिया भी खाएंगे पान। यानी धान कोई महंगी वस्तु नहीं। दुर्लभ भी नहीं। कहावत भी उस समय बनी होगी जब किसान के घरों में पैसा नहीं होता था। कहावत में धान को गरीब का साथी बताया गया है। धान से ही पान मिलेगा तोए मेरा पिया भी पान खाएगा। ऐसे में बखारी ही उस समय किसानों का बैंक हुआ करता था।अन्नदाताओं और उसके भंडारण का महत्व हमारे यहां कि इस कहावत से आप समझ सकते हैं।


बखारी या अन्नागार में अन्न को भंडारित किया जाता है। प्राचीन काल में मिट्टी के बर्तनों में अन्न भंडारित किया जाता था। कुछ किसान कच्ची मिट्टी और भूसे से अन्नागार बनाते थे जिसको ‘डेहरी’ कहा जाता था। इसे ‘अन्न की कोठी’ भी कहते हैं।

बांस और घास-फूस की मदद से बखारी बनाया जाता है। बखारी को मिट्टी से लेपकर उसे खूबसूरत बना देते हैं किसानी करने वाले लोग। कई बखारी में लोक कलाओं को शामिल किया जाता है। बखारी किसानों की लोक कला संस्कृति का बेजोड़ नमूना है। माटी से अन्न का जुड़ाव भंडारण की देसी पद्धति का सबसे नायाब उदाहरण है। उत्तर बिहार के ग्रामीण इलाकों में एक समय में आपको हर घर के सामने बखारी देखने को मिल जाता, लेकिन समय के साथ-साथ बखारी की संख्या कम होती चली गई। इसके पीछे कई कारण हैं। बखारी मतलब अनाज के लिए बना भंडारगृह, जहां धान-गेहूं रखे जाते हैं।


बखारी शब्द का प्रयोग ग्रामीण इलाकों में कई मुहावरों में किया जाता है। मसलन गे गोरी तोहर बखारी में कतै धान। (ओ, गोरी तेरे भंडार में है कितना धान) बखारी बांस और फूस के सहारे बनाया जाता है। यह गोलाकार होता है और इसके ऊपर फूस (घास) का छप्पर लगा रहता है। इसके चारों तरफ मिट्टी का लेप लगाया जाता है। (जैसे झोपड़ी बानई जाती है) बखारी का आधार धरती से लगभग पांच फुट ऊपर रहता है, ताकि चूहे इसमें प्रवेश नहीं कर पाएं।


उत्तर बिहार के ग्रामीण इलाकों में अभी भी बखारी आसानी से देखे जा सकते हैं। हर किसान के घर के सामने बखारी बना होता है। जिस किसान के घर के सामने जितना बखारी, मानो वही है गाँव का सबसे बड़ा किसान। कई के घर के सामने तो 10 से अधिक बखारी भी होते हैं, हालांकि स्टोर परम्परा के आने के बाद पुरानी बखारी परम्परा कमजोर हो गई है।


इन बखारियों से अन्न निकला भी अलग तरीके से जाता है। इसके ऊपर में जो छप्पर होता है, उसे बांस के सहारे उठाया जाता है और फिर सीढ़ी के सहारे लोग उसमें प्रवेश करते हैं और फिर अन्न निकालते हैं। एक बखारी में कितना अनाज है, इसका अंदाजा किसान को होता है।

हर एक का अलग साइज होता है। इसे मन (40 किलोग्राम-एक मन) के हिसाब से बनाया जाता है। बखारी की दुनिया ऐसी ही कई कहानियों से भरी पड़ी है।


कुछ किसान तो अपने आंगन में छोटी बखारी भी बनाकर रखते थे। इन बखारियों को खासकर महिलाओं के लिए बनाया जाता था। इसकी ऊंचाई कम हुआ करती थी, ताकि आसानी से महिलाएं अन्न निकाल सके। धान और गेहूं के लिए जहां इस तरह की बखारी बनाई जाती थी वहीं चावल के लिए कोठी बनाया जाता था।

कोठी पूरी तरह से माटी का होता था। इसे महिलाएं और पुरुष कारीगर खूब मेहनत से बनाते थे। धीरे-धीरे गाँव घर से यह सारी चीजें गायब होती जा रही हैं। ग्राम्य संस्कृति इन चीजों के बिना हमें अधूरी लगती है।

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